Friday, June 27, 2014

अमावट

अमावट 

बचपन में मौसम ,
या हर मौसम में बचपना ,
बारिश की रिमझिम ,
वो बूंदों पर थिरकना ,
त्योहारों की हलचल में ,
माँ की रसोई में फटकना ,
स्वेटर  के निकलने पर ,
धूप  में पतंगों को गिनना ,
फिर आम के बागों में ,
छुप कर पेड़ों पर लटकना ,
हमेशा सुगबुगाता है ,
परत दर परत ,
गीली रेत पर ,
वो मनचाही  लकीरों का बनना ,
उमर दर उमर ,
वक़्त दर वक़्त ,
ज़िन्दगी अमावट सी लगती है ,
ख़ुशी का मीठापन ,
और ग़मों की खटास,
चलते है साथ ,रहते है आस पास ,
खटास ना हो तो मीठेपन का कैसा अहसास !

तूलिका  


Monday, May 13, 2013

नई उड़ान


          नई उड़ान 

हौसलों  की  नयी उड़ान ,
मै  तुम और नन्ही मुस्कान । 

की सपने नए है ,की दीखते खड़े है ,
की पाना है उनको ,जो आगे बढे है ,
की तुम न मचलना , न तुम डगमगाना , 
की हम भी कई तूफानों से लड़े  है ,
मिली है हमको ये सोगात विहान ,

मै  तुम और नन्ही मुस्कान ,
हौसलों  की  नयी उड़ान । 

तूलिका 

Friday, November 11, 2011

परिवर्तन


परिवर्तन 

रगड़ते बर्तनों से जैसे रगड़ आवाज़ होती है ,
कहीं चुभे कोई जज्बा तो रोती साज़ होती है ,
संभाला  था उसने कई बार उसको ,
लेकिन हर बार कहाँ वो आँख से इनकार होती  है |

वो दिन कल ही था जब माँ ने पसंद की थी मेरी चप्पल ,
की चलो अब हम दोनों के कदम इससे सवरेंगे,
की तुम कंधे को पार कर  आ गई हो पास में ,
अब हम भी अहले चमन पर राज़ करेंगे |

कांटे भी हो साथ  ,चलना संभलकर ,
की मंजिल पर कई राही साथ मिलेंगे ,
हमनफस ,हमजुबान हमसफ़र भले दिखें ,
कदम साथ रख बढ़ने की कोशिश कम करेंगे |

गीले आटे से ना बन पाए जैसे रोटी ,
निराशा के बादल वो झंझावार करेंगे ,
रोंके तुम्हे कड़कती बिजलियों की चमक ,
गर  डटी रहो तो मानसून बदलेंगे |

इतना समझकर भी क्यूँ आँचल है तुम्हारा गीला,
निश्चिन्त रहो माँ हम पतवार मोड़ेंगे ,
समय के दो अंश आज आगे जो चल रहे ,
तुम देखना सब एक दिन धार बदलेंगे |

तूलिका 

Thursday, November 3, 2011

परिंदा


परिंदा 

शोर कोतुहल से कही दूर ढूंढ़ता है बसेरा ,
ये मन का परिंदा |
वो मीठी मुस्कान ,वो पिली सरसों का डेरा ,
ये मन का परिंदा |
फ़िक्र भी उड़ती रहे ,जहाँ  निश्चिन्त  हो सवेरा ,
ये मन का परिंदा |
चांदिनी  रात  घास पर ओस का घेरा , 
ये मन का परिंदा  |
साथ ऐसा  जो  ना  हो मटमैला ,  
ये मन का परिंदा |
ऐसी  ज़मी  जहा खुशियों  का हो मेला,  
ये मन का परिंदा \
मुल्क   ना   सरहद  ना सीमओं  ने  हो टोका  ,
की  अनंत  आकाश  को  उड़ने  चला  ,
ये मन का परिंदा |

तूलिका

Thursday, October 13, 2011

प्रवास



प्रवास 

चिड़ियों  का  चहचहाना   
वो माँ  का   उठाना  ,
वो डांटना  चिल्लाना ,
वो आँखे  दिखाना ,
की सूरज  है सर  पर ,
है गेहूं  सुखाना ,
रह रह सताता है घर से दूर जाना |

छोटी  का  हँसाना  ,
वो इतराकर  बिदकना ,
कमसिन  उम्र  में  भी,
समझदार बनना ,
की तुम  उड़  पडोगी ,
है आकाश  छूना  .
रह रह सताता है घर से दूर जाना|

पिता  का  ओट  से वो पल  पल  निहारना ,
नजदीक  आकर  वो भोहे  चढ़ाना ,
की ये  राजनीति ,
वो सामाजिक  धारणा ,
 चाहकर भी है दायित्व  निभाना ,
रह रह सताता है घर से दूर जाना |

सब  कमरे  वही  है,
बालकनी  वही  है,
तीन  डैने  वाले  वो पंखे  वही  है,
वो आँगन  ,वो छत   ,वो दीवार  वही  है,
दीवार  पर  लगे  मैप   वही  है ,
 बदली  तस्वीरें  ,वो आयना  वही  है
बदल  रहा  बस  कलेंडर 
वो उम्र   के  हफ्ते  ,महीने  है  बदले 
है बदले  कई  सालों    के अपने है बदले  ,
की सपनो को  बुनना ,
है उनको  है पाना ,
रह रह सताता है घर से दूर जाना |


ये  घडी  भी निभाना 
की पलकें  भिंगाना   ,
रफ़्तार  पकडती  ट्रेन  से,
दूर तक  हाँथ  हिलाना ,
की लम्बे  सफ़र  में ,
है कई  मक़ाम  पाना, 
रह रह सताता है घर से दूर जाना |

तूलिका